दुनिया की सबसे बड़ी साइकिल कंपनी बनाने वाले ओ.पी.मुंजाल का प्रेरणादायक जीवन

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O.P.Munjal

ओ. पी. मुंजाल को साइकिल उधोग का जनक कहा जाता है | ओ. पी. मुंजाल दुनिया की सबसे बड़ी भारतीय साइकिल कंपनी “Hero Cycles” के चेयरमैन थे | उनका जन्म 26 अगस्त 1928 को कमालिया (पाकिस्तान) में हुआ था | उनके पिता का नाम बहादुर चंद मुंजाल तथा माता का नाम ठाकुर देवी था | उनके परिवार में एक बेटा पंकज मुंजाल तथा चार बेटियां हैं | 87 वर्ष की आयु में D.M.C. Hero Heart Center अस्पताल में 13 अगस्त 2015 को उनका निधन हो गया | अपने बिगड़ते स्वास्थ्य को देखते हुए उन्होंने कुछ दिन पहले ही कंपनी की बागडोर अपने बेटे पंकज मुंजाल को सौंप दी थी | वर्तमान में पंकज मुंजाल Hero Cycles के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं | इस ग्रुप (Hero Cycles) में हीरो मोटर्स लिमिटेड, जेड.एफ. हीरो चेसिस सिस्टम्स एवं मुंजाल किरियू इंडस्ट्रीज और मुंजाल हास्पिटैलिटी और घर के सजावटी सामान बनाने वाली कंपनी ओमा लिविंग्स शामिल हैं। वर्तमान में हीरो साइकिल का टर्नओवर लगभग 2300 करोड़ रुपए है।

Two Wheeler मोटरसाइकिल बनाने वाली कंपनी हीरो मोटपकार्प ( Hero Motocorp) के मालिक ब्रजमोहनलाल मुंजाल हैं। वे ओ.पी. मुंजाल के भाई हैं।

शुरुआती जीवन
भारत-पाकिस्तान के बंटवारे से पहले उनका परिवार कमालिया (अब पाकिस्तान में) में रहता था। उनके पिता बहादुरचंद की अनाज की दुकान थी। बंटवारे के बाद ओ. पी. मुंजाल अपने तीन भाइयों ब्रजमोहन लाल मुंजाल, दयानंद मुंजाल और सत्यानंद मुंजाल के साथ लुधियाना आ गए | यहाँ आकर मुंजाल भाइयों ने अमृतसर की गलियों, फुटपाथों पर साइकिल के पुर्जे सप्लाई करने का काम शुरू किया। ओ.पी. शहर-शहर घूमकर पुर्जों के ठेके लेते थे।

हीरो साइकिल की शुरुआत
जब काम थोड़ा चल निकला तो 1956 में ओ.पी. मुंजाल ने बैंक से 50 हजार रुपए का कर्ज लिया और लुधियाना में साइकिल के पा‌र्ट्स बनाने की पहली यूनिट लगाई। कंपनी का नाम रखा Hero Cycles.  उसी साल उन्होंने पूरी साइकिल असेम्बल करना शुरू कर दिया। शुरुआत में 25 साइकिलें रोज बनती थीं।

हीरो साइकिल को बनाया नंबर वन
शुरुआत में 25 साइकिलें रोज बनाने वाली मुंजाल की कंपनी Hero Cycles 10 साल के अंदर ही 1966 में सालाना एक लाख साइकिल बनाने वाली कंपनी बन गयी। अगले दस साल में यह क्षमता बढ़कर सालाना पांच लाख से अधिक हो गई। 1986 तक Hero Cycles सालाना 22 लाख से अधिक साइकिलों का उत्पादन करने लगी थी । 1980 के दशक में Hero Cycles ने रोजाना 19 हजार साइकिलों के उत्पादन के साथ दुनिया की सबसे ब़़डी साइकिल कंपनी का दर्जा हासिल किया। इस उपलब्धि के लिए 1986 में Hero Cycles का नाम गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। वर्तमान में देश के साइकिल बाजार में Hero Cycles की हिस्सेदारी करीब 48 फीसदी है। यह सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि मध्य पूर्व, अफ्रीका, एशिया और यूरोप के 89 देशों में साइकिल निर्यात करती है।

लीडरशिप स्किल्स
Hero Cycles को दुनिया की नंबर वन कंपनी बनाने में ओ.पी.मुंजाल की लीडरशिप स्किल्स तथा दूरदर्शी सोच का ही कमाल है |
ओ.पी. मुंजाल अपने काम के प्रति ईमानदार थे। वे अपने कस्टमर्स को कभी निराश नहीं करते थे। उनके काम करने के तरीको तथा लीडरशिप को हम निम्न बातो में देख सकते हैं |

1. एक बार जब उनकी कंपनी के कर्मचारी हड़ताल पर थे तो ओ.पी. मुंजाल खुद ही मशीन चलाने लगे। कुछ सीनियर अधिकारियों ने उन्हें रोका और कहा – सर, आप ये मत करिए। जवाब में ओ.पी. बोले – आप चाहें तो घर जा सकते हैं। आप चाहे काम करें या न करें लेकिन मेरे पास ऑर्डर हैं और मैं काम करूंगा। उसके बाद कहा कि “एक बार डीलर तो समझ जायेंगे कि हड़ताल के कारण काम नहीं हो रहा है। लेकिन वह बच्चा कैसे समझेगा जिसके माता-पिता ने बर्थडे पर उसे साइकिल दिलाने का वादा कर रखा है और हमारी हड़ताल के कारण शायद उसे साइकिल न मिले। अगर मैं अपने बच्चे से वादा करूं तो यह अपेक्षा भी करूंगा कि उसे पूरा करूं। इसीलिए मैं जितनी साइकिल बना सकता हूं, बनाऊंगा। ये बात सुनकर सभी कर्मचारी वापस काम पर लौट आये और उस दिन जितने भी ऑर्डर पेंडिंग थे, सब पूरे कर दिए गए।

2. ओ.पी. मुंजाल इतने बड़े बिजनेस लीडर बनने के बावजूद डिजिटल टेक्नोलॉजी से दूर ही रहे। उनका मानना था कि टेक्नोलॉजी जरूरी है लेकिन टेक्नोलॉजी का गुलाम बनना जरूरी नहीं है। टेक्नोलॉजी को लेकर मुंजाल की सोच थी कि डिजिटल टेक्नोलॉजी आपकी प्रोडक्टिविटी की राह में रोड़ा बन जाती है। आपका मेलबॉक्स कई लोगों के ऐसे सी.सी. मेल्स से भरा होता है, जिनको जानने में किसी की दिलचस्पी नहीं होती। टेक्नोलॉजी आपकी परफॉर्मेंस की दुश्मन हो जाती है, जब प्रेजेंटेशन बनाने पर कई-कई हफ्ते बर्बाद होते हैं। जबकि इसी वक्त का इस्तेमाल टास्क पूरा करने में किया जा सकता है।

3. सन् 1990 में जब दूसरी कंपनियों की साइकिलों की सेल डाउन थी, मगर हीरो तरक्की कर रही थी। तब एक डीलर को कंपनी से एक चेक मिला, जिसके साथ मिले लेटर में लिखा था कि यह बोनस पेमेंट है। उसे हैरानी हुई तो उसने खुद मुंजाल को फोन करके मालूम किया कि मुझे बोनस क्यों दिया गया।
उन्होंने जवाब दिया कि एक कंसाइनमेंट के बदले आए पेमेंट में डॉलर के रेट की fluctuation के चलते 10 रुपए प्रति डॉलर का फायदा कंपनी को हुआ है। इस मुनाफे में कंपनी के कर्मचारी और डीलर भी बराबर के हकदार हैं। ऐसी बातें ही कर्मचारी और डीलर्स के मन को छू जाती थीं, जो तन-मन से कंपनी की तरक्की में मदद करते आ रहे हैं।

4. सन् 1980 में हीरो साइकिल से लदा ट्रक एक्सिडेंट में पलट गया और उसमे आग लग गयी जिससे पूरा कंसाइनमेंट जल गया । उन दिनों ट्रांसपोर्टेशन पर इंश्योरेंस नहीं होती थी। डीलर अपनी दुकान बंद करने वाला था | हादसे की खबर जब मुंजाल तक पहुंची तो उन्होंने सबसे पहले अपने मैनेजर से सवाल किया कि ड्राइवर तो ठीक है ना। फिर मैनेजर को हिदायत दी कि उस डीलर को फ्रेश कंसाइनमेंट भेजा जाए, क्योंकि इसमें डीलर की कोई गलती नहीं है, उसका नुकसान मेरा निजी नुकसान है।

ब्रिटेन में सुपर ब्रांड
2004 में हीरो साइकिल को ब्रिटेन में सुपर ब्रांड का दर्जा हासिल हुआ। आज हीरो साइकिल्स 14 करोड़ साइकिलों के निर्माण के साथ दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी का दर्जा हासिल कर चुकी है। कंपनी में फिलहाल 30 हजार कर्मचारी और दुनियाभर में 7500 आउटलेट्स हैं।

विदेशों में चर्चा
हीरो के प्रबंधन की बी.बी.सी. और व‌र्ल्ड बैंक ने भी तारीफ की है। लंदन बिजनेस स्कूल और इंसीड फ्रांस में हीरो कंपनी पर entrepreneurship के लिए केस स्टडी किया जाता है। हीरो साइकिल को इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट के लिए लगातार 28 साल से बेस्ट एक्सपोर्टर अवॉर्ड से नवाजा जा रहा है।

पुरस्कार और सम्मान
पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन, वीवी गिरि, जैल सिंह और एपीजे अब्दुल कलाम ओ.पी. मुंजाल को सम्मानित कर चुके हैं। 1990 में उन्हें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता अवॉर्ड दिया गया। ओपी को उर्दू शायरी काफी पसंद थी। 1994 में उन्हें साहित्य सेवा के लिए साहिर पुरस्कार दिया गया। वह बड़े परोपकारी थे। उन्होंने कई स्वास्थ्य और शिक्षा संस्थानों को दान किया। उन्हें पंजाब रत्न अवॉर्ड भी दिया गया था।

मुंजाल का जीवन बहुत लोगो को प्रेरणा देता है | उन्होंने साइकिल के छोटे छोटे पार्ट्स बेचने से शुरुआत की और अपनी सोच और दूरदर्शिता से दुनिया की सबसे ज्यादा साइकिल बनाने वाली अरबो की कंपनी खड़ी कर दी | उनके जीवन से हम यह प्रेरणा ले सकते है कि अगर हमारी सोच सही है तो हम मेहनत, लगन और दूरदर्शिता से छोटे से काम या छोटी सी दुकान या कंपनी को भी बहुत बड़ी कंपनी बना सकते है | और अपने व्यापार या दुकान को गली, मोहल्लो से निकाल कर दुनिया के सामने ला सकते हैं |

Source : Wikipedia , Internet.


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भारतरत्न डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम – भारत के मिसाइल मैन

डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ( 15-October-1931  to  27-July-2015 )

डॉ. अब्दुल कलाम आज़ाद - भारत के मिसाइल मैन डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम (डॉ. अवुल पाकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम ) एक ऐसा नाम है जिससे हर धर्म , हर उम्र के लोग अपने आपको जुड़ा हुआ महसूस करते हैं | एक ऐसा नाम जो लाखों, करोडो लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है | एक ऐसा नाम जो अपने आप में एक किताब है | एक ऐसा नाम जो दयालुता, उदारता, सज्जनता का पर्याय बन गया है | एक ऐसा नाम जिसे सभी धर्म, जाति, संप्रदाय के लोग सम्मान के साथ लेते हैं | ये नाम एक ऐसे महापुरुष का है जो दुनिया में बहुत ही कम मिलते है | ये महापुरुष आज पंचतत्व में विलीन हो गया | लेकिन उनका नाम, उनके विचार, उनके आदर्श हमेशा अमर रहेंगे और वर्तमान तथा आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा देते रहेंगे |

अब्दुल कलाम का प्रारंभिक जीवन

अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में एक मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार में हुआ था | इनके पिता का नाम जैनुल आब्दीन तथा माता का नाम आशियम्मा था | इनके पिता एक गरीब नाविक थे जो मछुआरों को किराये पर नाव देकर अपना गुजारा करते थे | इनके पिता का इन पर बहुत प्रभाव रहा | इनके पिता कम पढ़े लिखे थे लेकिन उनकी लगन और उनके संस्कार अब्दुल कलाम के बहुत काम आये | इनकी माता एक धर्मपरायण तथा दयालु महिला थीं | जिनके ये गुण अब्दुल कलाम के अंदर भी आ गए |

अब्दुल कलाम का बचपन

अब्दुल कलाम का बचपन बड़ा ही संघर्ष पूर्ण रहा। वे प्रतिदिन सुबह चार बजे उठ कर गणित का ट्यूशन पढ़ने जाया करते थे। वहाँ से 5 बजे लौटने के बाद वे अपने पिता के साथ नमाज पढ़ते, फिर घर से तीन किलोमीटर दूर स्थित धनुषकोड़ी रेलवे स्टेशन से अखबार लाते और पैदल घूम-घूम कर अखबार बेचते थे। 8 बजे तक वे अखबार बेच कर घर लौट आते थे। उसके बाद वे स्कूल जाते। स्कूल से लौटने के बाद शाम को वे अखबार के पैसों की वसूली के लिए निकल जाते थे।

कलाम की लगन और मेहनत के कारण उनकी माँ खाने-पीने के मामले में उनका विशेष ध्यान रखती थीं। दक्षिण में चावल की पैदावार अधिक होने के कारण वहाँ रोटियाँ कम खाई जाती हैं। लेकिन इसके बावजूद कलाम को रोटियों का बेहद शौक था। इसलिए उनकी माँ उन्हें प्रतिदिन खाने में दो रोटियाँ जरूर दिया करती थीं। एक दिन खाने में रोटियाँ कम थीं। यह देखकर माँ ने अपने हिस्से की रोटी कलाम को दे दी। उनके बड़े भाई ने कलाम को धीरे से यह बात बता दी। इससे कलाम अभिभूत हो उठे और दौड़ कर माँ से लिपट गये।

अब्दुल कलाम का विधार्थी जीवन

5 वर्ष की अवस्था में रामेश्वरम के पंचायत प्राथमिक विद्यालय से उनकी शिक्षा हुई | प्राइमरी स्कूल के बाद कलाम ने श्वार्टज़ स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की | इसके बाद 1950 में सेंट जोसेफ कॉलेज , त्रिची में प्रवेश लिया | वहाँ से उन्होंने भौतिकी और गणित विषयों के साथ B.Sc. की डिग्री प्राप्त की | 1958 में कलाम ने मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिग्री ली |

अब्दुल कलाम का व्यावसायिक जीवन

1962 में कलाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) से जुड़े। डॉक्टर अब्दुल कलाम को प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में भारत का पहला स्वदेशी उपग्रह (S.L.V. III) प्रक्षेपास्त्र बनाने का श्रेय हासिल हुआ। 1980 में इन्होंने रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के निकट स्थापित किया था। इस प्रकार भारत भी अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लब का सदस्य बन गया। इसरो लॉन्च व्हीकल प्रोग्राम को परवान चढ़ाने का श्रेय भी इन्हे ही जाता है। डॉक्टर कलाम ने स्वदेशी लक्ष्य भेदी (Guided Missiles) को डिजाइन किया। इन्होंने Agni एवं पृथ्वी जैसी मिसाइल्स को स्वदेशी तकनीक से बनाया था। डॉक्टर कलाम जुलाई 1992 से दिसम्बर 1999 तक रक्षा मंत्री के विज्ञान सलाहकार तथा सुरक्षा शोध और विकास विभाग के सचिव थे। उन्होंने स्ट्रेटेजिक मिसाइल्स सिस्टम का उपयोग आग्नेयास्त्रों के रूप में किया। इसी प्रकार पोखरण में दूसरी बार न्यूक्लियर विस्फोट भी परमाणु ऊर्जा के साथ मिलाकर किया। इस तरह भारत ने परमाणु हथियार के निर्माण की क्षमता प्राप्त करने में सफलता अर्जित की। डॉक्टर कलाम ने भारत के विकासस्तर को 2020 तक विज्ञान के क्षेत्र में अत्याधुनिक करने के लिए एक विशिष्ट सोच प्रदान की। यह भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे। 1982 में वे भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में वापस निदेशक के तौर पर आये और उन्होंने अपना सारा ध्यान “Guided Missiles” के विकास पर केन्द्रित किया। अग्नि मिसाइल और पृथवी मिसाइलका सफल परीक्षण का श्रेय काफी कुछ उन्हीं को है। जुलाई 1992 में वे भारतीय रक्षा मंत्रालय में वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त हुये। उनकी देखरेख में भारत ने 1998 में पोखरण में अपना दूसरा सफल परमाणु परीक्षण किया और परमाणु शक्ति से संपन्न राष्ट्रों की सूची में शामिल हुआ।

मृत्यु

27 जुलाई 2015 को शिलांग में एक लेक्चर देने के दौरान दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया | उनकी मृत्यु से सारा देश जैसे अवाक् रह गया | एकाएक किसी को विश्वास ही नहीं हुआ | हर किसी को ऐसे महसूस हुआ कि जैसे कोई अपना उन्हें छोड़कर चला गया हो | उनकी मृत्यु पर सारा देश रो पड़ा | उनकी मृत्यु से ऐसा लगा कि जैसे एक युग का अंत हो गया हो |

सम्मान

डॉ0 कलाम की विद्वता तथा योग्यता को देखते हुए सम्मान स्वरूप उन्हें अन्ना यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, कल्याणी विश्वविधालय , हैदराबाद विश्वविधालय, जादवपुर विश्वविधालय, बनारस हिन्दू विश्वविधालय, मैसूर विश्वविधालय, रूड़की विश्वविधालय, इलाहाबाद विश्वविधालय, दिल्ली विश्वविधालय, मद्रास विश्वविधालय, आंध्र विश्वविधालय, भारतीदासन छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविधालय, तेजपुर विश्वविधालय, कामराज मदुरै विश्वविधालय, राजीव गाँधी प्रौद्यौगिकी विश्वविधालय, आई.आई.टी. दिल्ली, आई.आई.टी. मुम्बई, आई.आई.टी. कानपुर, बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी, इंडियन स्कूल ऑफ साइंस, सयाजीराव यूनिवर्सिटी औफ बड़ौदा, मनीपाल एकेडमी ऑफ हॉयर एजुकेशन, विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी ने अलग-अलग “डॉक्टर ऑफ साइंस” की मानद उपाधियाँ प्रदान की।

इसके अतिरिक्त् जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने उन्हें “Ph.D.” (डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी) तथा विश्वभारती शान्ति निकेतन और डॉ0 बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, औरंगाबाद ने उन्हें “D. Lit” (डॉक्टर ऑफ लिटरेचर) की मानद उपाधियाँ प्रदान कीं।

इनके साथ ही साथ वे इण्डियन नेशनल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग, इण्डियन एकेडमी ऑफ साइंसेज, बंगलुरू, नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली के सम्मानित सदस्य, एरोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया, इंस्टीट्यूशन ऑफ इलेक्ट्रानिक्स एण्ड् टेलीकम्यूनिकेशन इंजीनियर्स के मानद सदस्य, इजीनियरिंग स्टॉफ कॉलेज ऑफ इण्डिया के प्रोफेसर तथा इसरो के विशेष प्रोफेसर हैं।

पुरस्कार

उनके द्वारा किये गये विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकास में उनके योगदान के कारण उन्हें विभिन्न संस्थाओं ने अनेक पुरस्कारों से नवाजा है। उनको मिले पुरस्कार निम्नानुसार हैं:

1. नेशनल डिजाइन एवार्ड-1980 (इंस्टीटयूशन ऑफ इंजीनियर्स, भारत)

2. डॉ0 बिरेन रॉय स्पे्स अवार्ड-1986 (एरोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इण्डिया)

3. ओम प्रकाश भसीन पुरस्कार

4. राष्ट्रीय नेहरू पुरस्कार-1990 (मध्य प्रदेश सरकार)

5. आर्यभट्ट पुरस्कार-1994 (एस्ट्रोपनॉमिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया)

6. प्रो. वाई. नयूडम्मा (मेमोरियल गोल्ड मेडल-1996 , आंध्र प्रदेश एकेडमी ऑफ साइंसेज)

7. जी.एम. मोदी पुरस्कार-1996,

8. एच.के. फिरोदिया पुरस्कार-1996

9. वीर सावरकर पुरस्कार-1998 आदि।

उन्हें राष्ट्रीय एकता के लिए इन्दिरा गाँधी पुरस्कार (1997) भी प्रदान किया गया। इसके अलावा भारत सरकार ने उन्हें क्रमश: पद्म भूषण (1981), पद्म विभूषण (1990) एवं “भारत रत्न” सम्मान (1997) से भी विभूषित किया गया।

व्यक्तित्व

डॉ. अब्दुल कलाम भारतीय गणतंत्र के 11वे निर्वाचित राष्ट्रपति थे | उन्हें भारत में मिसाइल मैन के नाम से भी जाना जाता है | डॉ. कलाम ने आजीवन अविवाहित रहकर अपनी पूरी जिंदगी देश की सेवा में समर्पित कर दी | उन्होंने शिक्षा पर हमेशा जोर दिया | उनके अनुसार शिक्षा से ही हम अपने आपको तथा अपने देश को बेहतर बना सकते हैं |उनके जैसा महापुरुष सदियों में एकाध ही जन्म लेता है | डॉ. कलाम बेहद अनुशासनप्रिय, शाकाहार तथा ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों में से हैं | ऐसा कहा जाता है कि वे कुरान तथा भगवत गीता दोनों का अध्ययन करते थे | वे स्वाभाव से बेहद विनम्र , दयालु , बच्चो से प्यार करने वाले व्यक्तित्व थे | भारत की वर्तमान पीढ़ी तथा आने वाली पीढ़ी उनके महान व्यक्तित्व से प्रेरणा लेती रहेगी |

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Source : Wikipedia , Internet.


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एक तांगे वाले से अरबपति बनने तक का सफ़र

जमीन से आसमान तक  सीरीज में मैं आज आपके सामने पेश कर रहा हूँ एक ऐसे व्यक्ति की कहानी जिन्होंने बहुत सी विपरीत परिस्तिथियों  के बावजूद हिम्मत नहीं हारी और मुश्किलों , विपरीत परिस्तिथियों को हराकर आसमान की बुलंदियों को छुआ |

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उस व्यक्ति का नाम है महाशय धर्मपाल गुलाटी | महाशय धर्मपाल किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं | महाशय धर्मपाल मसालों की सबसे बड़ी कंपनी M.D.H. (जिसका पूरा नाम महाशियाँ दी हट्टी है ) के चेयरमैन तथा विश्व प्रसिद्ध समाज सेवी हैं और इनकी गिनती आज देश के बड़े अरबपतियों में होती है | लेकिन ये शुरुआत से ही अमीर नहीं हैं | इन्होने यह मुकाम बड़े ही संघर्ष के बाद हासिल किया है |

महाशय धर्मपाल का जन्म 27 मार्च 1923 में पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था | उनके पिता का नाम महाशय चुन्नी लाल तथा माता का नाम चनन देवी है | महाशय धर्मपाल सिर्फ 5वीं  तक पढ़े हैं | इनके पिता सियालकोट में मिर्च मसालों की दुकान चलाते थे | 5वीं के बाद इनके पिता ने रोजगार के लिए इन्हे कभी साबुन की फैक्ट्री तो कभी चावल की फैक्ट्री में, कभी कपडे के काम में लगाया तो कभी हार्डवेयर के काम में लगाया लेकिन इनका मन कहीं नहीं लगा | तब हारकर इनके पिता ने इन्हे अपनी दुकान पर लगा लिया |

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इसके बाद 1947 में देश विभाजन के समय ये पाकिस्तान में अपना सब कुछ छोड़कर दिल्ली आ गए और दिल्ली कैंट क्षेत्र में पूरे परिवार के साथ एक शरणार्थी कैंप में रहे | उस समय इनके पास मात्र 1500 रूपए थे | वक्त की मार और बेरोजगारी से, तथा अपना घर न होने से भी धर्मपाल टूटे नहीं और अपने तथा अपने परिवार के भरण पोषण के लिए काम ढूँढने चाँदनी चौक गए | वहाँ कम पढ़ा लिखा होने तथा मन का काम ना मिलने के बाद इन्होने 650 रूपए में एक घोडा तांगा खरीदा | कुछ समय तक उन्होंने दिल्ली की सड़कों पर दो आने प्रति सवारी की दर पर तांगा चलाया | कुछ दिन तांगा चलाने के बाद इन्हे ये काम भी पसंद नहीं आया | और इन्होने तांगा बेचकर एक लकड़ी का खोखा खरीद लिया और अपना पुश्तैनी मसालों का धँधा शुरू किया तथा उसका नाम रखा सियालकोट वाले महाशियाँ दी हट्टी देगी मिर्च वाले | दूरदृष्टि , निरंतर मेहनत, ईमानदारी और मसलों की उत्तम गुणवत्ता से यह धँधा चल निकला | इसके बाद इन्होने खोखा छोड़कर एक दुकान ले ली | फिर धीरे धीरे दुकान से फैक्ट्री, फैक्ट्री से कंपनी बन गयी और आज महाशियाँ दी हट्टी मसालों के क्षेत्र में एक ब्रांड बन गयी जिसने आज M.D.H के नाम से देश दुनियाँ में अपनी अलग पहचान बना ली है | M.D.H. मसालों के क्षेत्र में सबसे बड़ी कम्पनी है जिसके मसालों की धूम ना केवल भारत में बल्कि दुनियाँ के हर देश में है |

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आज M.D.H. के ऑफिस तथा Outlets भारत के हर शहर के अलावा लंदन,  दुबई , U.S. , U.K. , कनाडा , यूरोप , ऑस्ट्रेलिया, साउथ अफ्रीका, न्यूजीलैंड , हांगकांग, सिंगापुर, चीन, जापान समेत दुनियाँ के ज्यादातर देशो में हैं |

महाशय धर्मपाल ने कभी किसी काम को छोटा नहीं समझा और हर काम को मेहनत से किया | इसी मेहनत की बदौलत महाशय धर्मपाल आज 92 वर्ष की उम्र में भी उनमे जवानो वाला जोश है | उनकी दिनचर्या सुबह 4:30 से शुरू हो जाती है जो रात लगभग 11 बजे तक चलती है |

महाशय धर्मपाल ने सेवा भाव हमेशा से अपने दिल में रखा है | विशाल ह्रदय वाले महाशय धर्मपाल से अनेकों स्कूल, कॉलेज तथा अस्पताल बनवाएं हैं जो M.D.H. ट्रस्ट द्वारा संचालित होते हैं और यहाँ बहुत ही कम दामों पर सेवाएं मिलती हैं जिससे गरीबों का बहुत भला होता है | इन्होने अनेकों गरीब लड़कियों की शादियां करवाई हैं और ना जाने कितने सेवा केंद्र इनके ट्रस्ट से संचालित किये जाते हैं |

दोस्तों जब अपना घरबार सब कुछ छोड़ने के बाद, बेरोजगार और अपना घर ना होने पर भी एक शख्स नहीं टूटा और जब एक तांगा चलाने वाला शख्स , एक 5वीं पास शख्स अपनी मेहनत और लगन से अरबपति बन सकता है, देश दुनियाँ में ना कमा सकता है, आसमान की बुलंदियों को छू सकता है तो फिर आप क्यों नहीं |

तो दोस्तों मुश्किलों और बाधाओं से कभी घबराएं नहीं बल्कि विपरीत परिस्तिथियों का दृढ़ता से सामना करें  तथा अपने बनाये हुए लक्ष्यों , अपने सपनों को पूरा करने के लिए निरंतर मेहनत करते रहे | एक दिन आप सभी मुश्किलों को हराकर जीत जायेंगे और आसमान की बुलंदियों को छुएंगे |

Best of Luck !!


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विल्मा रुडोल्फ – जिन्होंने किया नामुमकिन को मुमकिन

दोस्तों, आज मैंने  जमीन से आसमान तक  नाम से एक नयी सीरीज शुरू की है जिसमे आपको मैं आपको उन लोगो की प्रेरणादायक कहानियों के बारे में बताऊँगा जिन्होंने बहुत ही अभावो, कठिन परिस्तिथियों, मुश्किलो से निकलकर तमाम बाधाओं और असफलताओं को हराकर आसमान की बुलंदियों को छुआ है | मैं आशा करता हूँ की ये कहानियाँ ज़रूर आपके लिए लाभदायक साबित होंगी |

जमीन से आसमान तक  सीरीज में मैं आज आपके सामने पेश कर रहा हूँ एक ऐसी लड़की की कहानी जिसने बहुत अभावों, गरीबी से निकलकर आसमान की बुलंदियों को छुआ है |

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उस लड़की का नाम है विल्मा रुडोल्फ | विल्मा का जन्म 1939 में अमेरिका के टेनेसी राज्य के एक गरीब परिवार में हुआ था| विल्मा के पिता रुडोल्फ एक कुली थे तथा माँ एक सर्वेंट थी | चार साल की उम्र में विल्मा को बुखार और निमोनिया हो गया जिससे उसे पोलियो हो गया और वह विकलांग हो गई| उसे पैरों में लोहे के ब्रेस पहनने पड़े | काफी इलाज के बाद डॉकटरों ने भी हार मान ली और कह दिया कि वह कभी भी बिना ब्रेस के नहीं चल नहीं पायेगी।

विल्मा की माँ एक सकारात्मक मनोवृत्ति की महिला थी | विल्मा का मनोबल बना रहे इसलिए उसकी माँ ने उसका एक स्कूल में दाखिला करा दिया | उन्होंने उसका हौसला बढ़ाया तथा कहा कि इस संसार में कुछ भी नामुमकिन नहीं है, तुम जो चाहो प्राप्त कर सकती हो | विल्मा ने अपनी माँ से कहा – ‘क्या मैं दुनिया की सबसे तेज दौड़ने वाली महिला बन सकती हूं ?’’
इस पर माँ ने विल्मा से कहा कि ईश्वर पर विश्वास, मेहनत और लगन से तुम जो चाहो बन सकती हो|

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माँ की बात विल्मा के मन में इस कदर बैठ गयी कि नौ साल की उम्र में उसने जिद करके डॉकटरो की सलाह के विपरीत अपने ब्रेस निकलवा दिए और चलने की कोशिश की | बिना ब्रेस के चलने की कोशिश में वह कई बार गिरी, कई बार चोटिल हुई और दर्द सहन करती रही लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी तथा लगातार कोशिश करती रही | आखिर में परिस्तिथियाँ उसकी जिद के सामने हार गयीं और दो वर्ष की कड़ी मेहनत  के बाद वह बिना ब्रेस के तथा बिना किसी सहारे के चलने में कामयाब हो गई|

जब ये बात विल्मा के डॉक्टर को पता चली तो वे उससे मिलने आये | उन्होंने विल्मा को चलते हुए देखकर कहा कि – शाबाश बेटी ! तुमने अपनी मेहनत और लगन से मेरी बात को झूठा साबित कर दिया | उन्होंने उसे सीने से लगाते हुए कहा कि तुम्हारे अंदर जो आत्मविश्वास है, जो लगन है उससे तुम खूब दौड़ोगी और एक दिन सबको पीछे छोड़ दोगी, तुम्हे कोई नहीं रोक सकता |

13 वर्ष की उम्र में विल्मा ने पहली बार दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और बहुत बड़े अंतर से सबसे आखिरी स्थान पर आई। लेकिन उसने हार नहीं मानी और और लगातार दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती रही | कई बार हारने के बावजूद वह पीछे नहीं हटी और कोशिश करती रही | और एक ऐसा दिन भी आया जब उसने प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया।

15 वर्ष की उम्र में उसने टेनेसी राज्य विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया जहाँ उसे कोच एड टेम्पल मिले| विल्मा ने टेम्पल को अपनी इच्छा के बारे में बताया कि वह दुनियां कि सबसे तेज धाविका बनना चाहती है| टेंपल ने उसकी इच्छा शक्ति तथा आत्मविश्वास को देखकर कहा कि तुम्हे कोई नहीं रोक सकता और इसमें मैं तुम्हारी मदद करूँगा |

अब तो विल्मा ने रात दिन एक कर दिया और अपने प्रदर्शन को सुधारती गई | और आख़िरकार उसे ओलम्पिक में भाग लेने का मौका मिल ही गया| ओलम्पिक में विल्मा का सामना एक ऐसी धाविका (यूटा हेन) से हुआ जिसे तब तक कोई नहीं हरा सका था| पहली रेस 100 मीटर की थी जिसमे विल्मा ने यूटा को हराकर स्वर्ण पदक जीत लिया | दूसरी रेस 200 मीटर कि थी इसमें भी विल्मा के सामने यूटा ही थी तथा इसमें भी विल्मा ने यूटा को हरा दिया और दूसरा स्वर्ण पदक जीत लिया|

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तीसरी रेस 400 मीटर की रिले रेस थी जिसमे सबसे तेज दौड़ने वाला धावक सबसे आखिर में दौड़ता है | विल्मा का मुकाबला एक बार फिर यूटा की ही टीम से था | विल्मा और यूटा भी अपनी अपनी टीम में आखिर में दौड़ रही थीं| रेस शुरू हुई, विल्मा की टीम की पहली तीन धाविकाओं ने अपनी अपनी बेटन आसानी से बदल ली लेकिन जब विल्मा की बारी आई तो बेटन उसके हाथ से गिर गई | इसी बीच यूटा उससे आगे निकल गई | विल्मा ने बेटन उठाई और मशीन की तरह दौड़ती हुई यूटा से आगे निकल गई | और तीसरी बार यूटा को हराते हुए तीसरा स्वर्ण पदक भी जीत लिया |

यह इतिहास बन गया | ऐसा करिश्मा फिर दोबारा कभी नहीं हुआ | कभी पोलियो ग्रस्त रही एक लड़की, जिसे डॉकटरो ने कहा था कि यह कभी नहीं चल पायेगी, वह दुनिया की सबसे तेज दौड़ने वाली धाविका बन चुकी थी |

एक ऐसी लड़की जो बचपन में पोलियो ग्रस्त रही, जिसे डॉकटरो ने कहा था कि यह कभी नहीं चल पायेगी, वो अपने आत्मविश्वास, मेहनत और लगन से न केवल चली बल्कि ओलम्पिक में दौड़ी भी और तीन स्वर्ण पदक भी जीते | नामुमकिन को मुमकिन कर दिया था उसने |
उसने अपने जज्बे से तमाम मुश्किलो, कठिनाइयों को हराकर अपने सपने को साकार किया और दुनियाँ में सबसे तेज दौड़ने वाली धाविका बनी |

तो दोस्तों आप भी आत्मविश्वास, लगन तथा मेहनत के दम पर बड़ी से बड़ी मुश्किलों को हराकर अपने सपनो को साकार कर सकते हैं, आसमान की बुलंदियों को छू सकते हैं |


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