मुसीबतों से हिम्मत ना हारें

4एक किसान के पास एक बूढा गधा था | एक दिन किसान का गधा कुएँ में गिर गया । वह गधा घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा | किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं ? अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि गधा काफी बूढा हो चूका था,अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिए ।

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हमारे छोटे से प्रयास से भी बहुत बड़ा फर्क पड़ता है

3एक व्यक्ति रोज़ाना समुद्र तट पर जाता और वहाँ काफी देर तक बैठा रहता। आती-जाती लहरों को लगातार देखता रहता। बीच-बीच में वह कुछ उठाकर समुद्र में फेंकता, फिर आकर अपने स्थान पर बैठ जाता। तट पर आने वाले लोग उसे मंदबुद्धि समझते और प्राय: उसका मजाक उड़ाया करते थे। कोई उसे ताने कसता तो कोई अपशब्द कहता, किंतु वह मौन रहता और अपना यह प्रतिदिन का क्रम नहीं छोड़ता।

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अभ्यास क्यों जरुरी है

आप अपनी ज़िंदगी के किसी भी काम को ले लीजिये चाहे वो किसी एक खास क्षेत्र में एक्सपर्ट होना हो जैसे क्रिकेट, सिंगिंग, एक्टिंग या कोई परीक्षा पास करनी हो या फिर हमारा रोज़मर्रा का रोजगार | अगर हमें उस काम में निपुण होना है , दक्ष होना है तो उसका निरंतर अभ्यास करना पड़ेगा | बिना अभ्यास के हम निपुण नहीं हो सकते | अभ्यास असंभव को भी संभव कर देता है | आइये अभ्यास का महत्व इस कहानी से समझते हैं |

महाभारत के समय गुरु द्रोणाचार्य पांडवो तथा कौरवों को धनुर्विद्या की शिक्षा देते थे | उन्हीं दिनों हिरण्यधनु नामक निषादों के राजा का पुत्र एकलव्य भी धनुर्विद्या सीखने के उद्देश्य से द्रोणाचार्य के आश्रम में आया किन्तु निम्न वर्ण का होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे अपना शिष्य बनाना स्वीकार नहीं किया।
कारण पूछने पर द्रोणाचार्य ने बताया कि वे हस्तिनापुर के राजा को वचन दे चुके हैं कि वे सिर्फ राजकुमारों को ही शिक्षा देंगे |

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निराश होकर एकलव्य वन में चला गया। उसने द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई और उस मूर्ति को गुरु मान कर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। एकाग्रचित्त मन से साधना करते हुये अल्पकाल में ही वह धनुर्विद्या में अत्यन्त निपुण हो गया।

एक दिन सारे राजकुमार गुरु द्रोण के साथ आखेट के लिये उसी वन में गये जहाँ पर एकलव्य आश्रम बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था। राजकुमारों के साथ एक कुत्ता भी था | राजकुमारों का कुत्ता भटक कर एकलव्य के आश्रम में जा पहुँचा। एकलव्य को देख कर वह भौंकने लगा। इससे क्रोधित हो कर एकलव्य ने उस कुत्ते पर अपना बाण चला-चला कर उसके मुँह को बाणों से से भर दिया। एकलव्य ने इस कौशल से बाण चलाये थे कि कुत्ते को किसी प्रकार की चोट नहीं लगी किन्तु बाणों से बिंध जाने के कारण उसका भौंकना बन्द हो गया।

कुत्ते के लौटने पर जब अर्जुन ने धनुर्विद्या के उस कौशल को देखा तो वे द्रोणाचार्य से बोले, “हे गुरुदेव! इस कुत्ते के मुँह में जिस कौशल से बाण चलाये गये हैं उससे तो प्रतीत होता है कि यहाँ पर कोई मुझसे भी बड़ा धनुर्धर रहता है।” अपने सभी शिष्यों को ले कर द्रोणाचार्य एकलव्य के पास पहुँचे और पूंछा, “हे वत्स! क्या ये बाण तुम्हीं ने चलाये हैं।?”

एकलव्य के स्वीकार करने पर उन्होंने पुनः प्रश्न किया,’तुम्हें धनुर्विद्या की शिक्षा देने वाले कौन हैं?’
एकलव्य ने उत्तर दिया, ‘गुरुदेव! मैंने तो आपको ही गुरु स्वीकार कर के धनुर्विद्या सीखी है।’ इतना कह कर उसने द्रोणाचार्य को उनकी मूर्ति के समक्ष ले जा कर खड़ा कर दिया। और कहा कि मैं रोज़ आपकी मूर्ति कि वंदना करके बाण चलने का कड़ा अभ्यास करता हूँ और इसी अभ्यास के चलते मैं आज आपके सामने धनुष पकड़ने के लायक बना हूँ |

द्रोणाचार्य ने कहा कि – तुम धन्य हो वत्स ! तुम्हारे अभ्यास ने ही तुम्हे इतना श्रेष्ठ धनुर्धर बनाया है और आज मैं समझ गया कि अभ्यास ही सबसे बड़ा गुरु है |

दोस्तों इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है निरंतर अभ्यास , कड़ी मेहनत और लगन से ही हम किसी काम में निपुण हो सकते है , श्रेष्ठ हो सकते है |


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खुश रहने का रहस्य

बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक महात्मा रहते थे | आसपास के गाँवो के लोग अपनी समस्याओं और परेशानियों के समाधान के लिए महात्मा के पास जाते थे | और संत उनकी समस्याओं, परेशानियों को दूर करके उनका मार्गदर्शन करते थे | एक दिन एक व्यक्ति ने महात्मा से पूछा – गुरुवर, संसार में खुश रहने का रहस्य क्या है ?

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महात्मा ने उससे कहा कि तुम मेरे साथ जंगल में चलो, मैं तुम्हे खुश रहने का रहस्य बताता हूँ | उसके बाद महात्मा और वह व्यक्ति जंगल की तरफ चल दिए | रास्ते में चलते हुए महात्मा ने एक बड़ा सा पत्थर उठाया और उस व्यक्ति को देते हुए कहा कि इसे पकड़ो और चलो | उस व्यक्ति ने वह पत्थर लिया और वह महात्मा के साथ साथ चलने लगा |

कुछ देर बाद उस व्यक्ति के हाथ में दर्द होने लगा लेकिन वह चुप रहा और चलता रहा | जब चलते चलते बहुत समय बीत गया और उस व्यक्ति से दर्द सहा नहीं गया तो उसने महात्मा से कहा कि उस बहुत दर्द हो रहा है | महात्मा ने कहा कि इस पत्थर को नीचे रख दो | पत्थर को नीचे रखते ही उस व्यक्ति को बड़ी राहत मिली |

तब महात्मा ने उससे पूछा – जब तुमने पत्थर को अपने हाथ में उठा रखा था तब तुम्हे कैसा लग रहा था |
उस व्यक्ति ने कहा – शुरू में दर्द कम था तो मेरा ध्यान आप पर ज्यादा था पत्थर पर कम था |
लेकिन जैसे जैसे दर्द बढ़ता गया मेरा ध्यान आप पर से कम होने लगा और पत्थर पर ज्यादा होने लगा और एक समय मेरा पूरा ध्यान पत्थर पर आ गया और मैं इससे अलग कुछ नहीं सोच पा रहा था |

तब महात्मा ने उससे दोबारा पूछा – जब तुमने पत्थर को नीचे रखा तब तुम्हे कैसा महसूस हुआ |

इस पर उस व्यक्ति ने कहा – पत्थर नीचे रखते ही मुझे बहुत रहत महसूस हुई और ख़ुशी भी महसूस हुई |

तब महात्मा ने कहा कि यही है खुश रहने का रहस्य !
इस पर वह व्यक्ति बोला – गुरुवर, मैं कुछ समझा नहीं |

तब महात्मा ने उसे समझाते हुए कहा – जिस तरह इस पत्थर को थोड़ी देर हाथ में उठाने पर थोड़ा सा दर्द होता है , थोड़ी और ज्यादा देर उठाने पर थोड़ा और ज्यादा दर्द होता है और अगर हम इसे बहुत देर तक उठाये रखेंगे तो दर्द भी बढ़ता जायेगा | उसी तरह हम दुखों के बोझ को जितने ज्यादा समय तक उठाये रखेंगे हम उतने ही दुखी और निराश रहेंगे | यह हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों के बोझ को थोड़ी सी देर उठाये रखते हैं या उसे ज़िंदगी भर उठाये रहते हैं |

इसलिए अगर तुम खुश रहना चाहते हो तो अपने दुःख रुपी पत्थर को जल्दी से जल्दी नीचे रखना सीख लो और अगर संभव हो तो उसे उठाओ ही नहीं |

तो दोस्तों इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि यदि हमने अपने दुःख रुपी पत्थर को उठा रखा है तो शुरू शुरू में हमारा ध्यान अपने लक्ष्यों पे ज्यादा तथा दुखो पर कम होगा |लेकिन अगर हमने अपने दुःख रुपी पत्थर को लम्बे समय से उठा रखा है तो हमारा ध्यान अपने लक्ष्यों से हटकर हमारे दुखों पर आ जायेगा | और तब हम अपने दुखों के अलावा कुछ नहीं सोच पाएंगे और अपने दुखो में ही डूबकर परेशान होते रहेंगे और कभी भी खुश नहीं रह पाएंगे |

इसलिए अगर आपने भी कोई दुःख रुपी पत्थर उठा रखा है तो उसे जल्दी से जल्दी नीचे रखिये मतलब अपने दुखो को , टेंशन को अपने दिलो दिमाग से निकल फेंकिए और खुश रहिये |


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अपनी क्षमताओ को पहचानिये

एक बार की बात है कि एक बाज का अंडा मुर्गी के अण्डों के बीच आ गया | कुछ दिनों बाद उन अण्डों में से चूजे निकले | बाज का बच्चा भी उनमे से एक था | वो उन्ही के बीच बड़ा होने लगा | वो भी वही करता जो बाकी चूजे करते, मिटटी में इधर-उधर खेलता, दाना चुगता और दिन भर उन्ही की तरह चूँ-चूँ करता | बाकी चूजों की तरह वो भी बस थोडा सा ही ऊपर उड़ पाता, और पंख फड़-फडाते हुए नीचे आ जाता | फिर एक दिन उसने एक बाज को खुले आकाश में उड़ते हुए देखा | बाज बड़े शान से बेधड़क उड़ रहा था | तब उसने बाकी चूजों से पूछा, कि – ” इतनी उचाई पर उड़ने वाला वो शानदार पक्षी कौन है?”

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तब चूजों ने कहा-” अरे वो बाज है, पक्षियों का राजा, वो बहुत ही ताकतवर और विशाल है , लेकिन तुम उसकी तरह नहीं उड़ सकते क्योंकि तुम तो एक चूजे हो!”

बाज के बच्चे ने इसे सच मान लिया और कभी वैसा बनने की कोशिश नहीं की | वो ज़िन्दगी भर चूजों की तरह रहा और एक दिन बिना अपनी असली ताकत पहचाने ही मर गया |

दोस्तों हममें से बहुत से लोग उस बाज के बच्चे की तरह ही अपनी असली ताकत जाने बिना एक साधारण ज़िंदगी जीते रहते है और अंत में वैसे ही मर जाते हैं | हम दूसरो को देखकर भी कभी कभी ये मान लेते हैं कि हम उनके जैसे नहीं बन सकते | जबकि वास्तविकता यह है कि हमसे पहले जिस किसी ने भी कोई काम किया है हम भी उसे कर सकते हैं | बस ज़रूरत है अपनी ताकत को जानने की , अपनी क्षमताओं को पहचानने की | एक बार अगर आपने अपनी ताकत को, अपनी प्रतिभा को, अपनी क्षमताओं को पहचान लिया तो फिर आपको बुलंदियों तक पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता |

आप चूजे की तरह मत बनिए |  अपने आप पर , अपनी काबिलियत पर भरोसा कीजिए | आप चाहे जहाँ हों, जिस परिवेश में हों, अपनी क्षमताओं को पहचानिए और आकाश की ऊँचाइयों पर उड़ कर दिखाइए क्योंकि यही आपकी वास्तविकता है.


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अपने मूल्य को पहचाने

एक बार एक जाना माना स्पीकर अपना सेमिनार कर रहा था | उसने हाथ में पाँच सौ का नोट लहराते हुए अपने हॉल में बैठे सैकड़ों लोगों से पूछा ,” ये पाँच सौ का नोट कौन लेना चाहता है?”

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सभा में बैठे लोगो ने हाथ उठाने शुरू कर दिए |

फिर उसने कहा ,” मैं इस नोट को आपमें से किसी एक को दूँगा पर उससे पहले मुझे ये कर लेने दीजिये .” और उसने नोट को अपनी मुट्ठी में भींच का मसलना शुरू कर दिया | और फिर उसने पूछा,” कौन है जो अब भी यह नोट लेना चाहता है?” अभी भी लोगों के हाथ उठने शुरू हो गए |

“अच्छा” उसने कहा,” और अगर मैं ये कर दूँ तो ? ” और उसने नोट को नीचे गिराकर पैरों से कुचलना शुरू  कर दिया | उसने नोट को उठाया, नोट कुचला हुआ और बहुत गन्दा हो गया था |

” क्या अभी भी कोई है जो इसे लेना चाहता है?” और एक बार फिर हाथ उठने शुरू हो गए |

तब उस स्पीकर ने कहा दोस्तों , आप लोगों ने आज एक बहुत महत्त्वपूर्ण पाठ सीखा है | मैंने इस नोट के साथ इतना कुछ किया पर फिर भी आप इसे लेना चाहते थे क्योंकि ये सब होने के बावजूद नोट की कीमत घटी नहीं,उसका मूल्य अभी भी 500 ही था |

जीवन में कई बार हम गिरते हैं, हारते हैं, हमारे लिए हुए निर्णय हमें मिटटी में मिला देते हैं | हमें ऐसा लगने लगता है कि हमारी कोई कीमत नहीं है. लेकिन आपके साथ चाहे जो हुआ हो या भविष्य में जो हो जाए , उससे आपका मूल्य कम नहीं होता | आप स्पेशल हैं, आप अमूल्य हैं  इस बात को कभी मत भूलिए |

कभी भी बीते हुए कल की निराशा से अपने आने वाले कल को बर्बाद मत कीजिये | अपने मूल्य को पहचानिये और सकारात्मक सोच के मेहनत करते रहें | सफलता ज़रूर मिलेगी | याद रखिये आपके पास जो सबसे कीमती चीज है, वो है आपका जीवन |


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अच्छाइयों को देखें बुराइयो को नहीं

16एक बार की बात है दो दोस्त रेगिस्तान से होकर गुजर रहे थे |  सफ़र के दौरान दोनों के बीच में किसी बात को लेकर कहा सुनी हो गयी.और उनमे से एक दोस्त ने दूसरे के गाल पर थप्पड़ मार दिया | जिसने थप्पड़ खाया था उसे बहुत आघात पहुँचा लेकिन वो चुप रहा और उसने बिना कुछ बोले रेत  पर लिखा – आज मेरे सबसे अच्छे मित्र ने मुझे  थप्पड़ मारा |

उसके बाद उन दोनों ने दुबारा चलना शुरू किया | चलते-चलते उन्हें एक नदी मिली दोनों दोस्त उस नदी में स्नान के लिए उतरे | जिस दोस्त  ने थप्पड़ खाया था उसका पैर फिसला और वो पानी में डूबने लगा , उसे तैरना नहीं आता था | दूसरे मित्र ने जब उसकी चीख सुनी तो वो उसे बचाने की कोशिश करने लगा और उसे निकाल कर बाहर ले आया |

अब डूबने वाले दोस्त ने पत्थर के ऊपर लिखा –आज मेरे सबसे अच्छे मित्र ने मेरी जान बचायी | वो दोस्त जिसने थप्पड़ मारा और जान बचायी उसने दूसरे से पुछा – जब मैंने तुम्हे थप्पड़ मारा तब तुमने रेत पर लिखा और जब मैंने तुम्हारी जान बचायी तब तुमने पत्थर पर लिखा , ऐसा क्यूँ ?

दूसरे दोस्त ने जवाब दिया –- रेत पर इसलिए लिखा ताकि वो जल्दी मिट जाये और पत्थर पर इसलिए लिखा ताकि वो कभी ना मिटे |

मित्रों, जब आपको कोई दुःख पहुँचाता है तब उसका प्रभाव आपके दिलोंदिमाग पर रेत पर लिखे शब्दों की तरह होना चाहिए जिसे क्षमा की हवाएं आसानी से मिटा सकें | लेकिन जब कोई आपके हित में कुछ करता है तब उसे पत्थर पर लिखे शब्दों की तरह याद रखें ताकि वो हमेशा अमिट रहे |

इसलिए किसी भी व्यक्ति की अच्छाई पर ध्यान दें न कि उसकी बुराई पर.


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सफलता का रहस्य

14एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या है?

सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनारे मिलो| वो लड़का अगले दिन नदी के किनारे सुकरात से मिला | फिर सुकरात ने नौजवान से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा| वे दोनों नदी में आगे बढ़ने लगे और जब आगे बढ़ते-बढ़ते पानी गले तक पहुँच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सिर पकड़ के पानी में डुबो दिया | लड़का बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा, लेकिन सुकरात ताकतवर थे और उसे तब तक डुबोये रखा जब तक कि वो लड़का नीला नहीं पड़ गया | फिर सुकरात ने उसका सिर पानी से बाहर निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो काम उस लड़के ने सबसे पहले किया वो था हाँफते-हाँफते तेजी से सांस लेना|

थोड़ा सामान्य होकर लड़के ने क्रोधित होकर सुकरात से पूछा – आप क्या मुझे मार डालना चाहते थे ?

सुकरात ने शांत स्वर में पूछा ,” जब तुम डूब रहे थे तो तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे?”

लड़के ने उत्तर दिया, ”सांस लेना”

सुकरात ने कहा,” यही सफलता का रहस्य है. जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना की तुम साँस लेना चाहते थे तो वो तुम्हे मिल जाएगी” इसके आलावा और कोई रहस्य नहीं है.

तो दोस्तों वो शिद्दत ही सफलता का रहस्य है जिसमें आप सब कुछ भुलाकर केवल एक ही लक्ष्य को पाने की चाहत रखते हैं |


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गुस्सा करने से पहले सोचें

एक बार मेहनती और ईमानदार नौजवान बहुत पैसे कमाना चाहता था । उसका सपना था कि वह मेहनत करके खूब पैसे कमाये और एक दिन अपने पैसे से एक कार खरीदे। जब भी वह कोई कार देखता तो उसका अपनी कार खरीदने का मन करता।

कुछ साल बाद उसकी अच्छी नौकरी लग गयी। उसकी शादी भी हो गयी और कुछ ही वर्षों में वह एक बेटे का पिता भी बन गया। सब कुछ ठीक चल रहा था मगर फिर भी उसे एक दुख सताता था कि उसके पास उसकी अपनी कार नहीं थी। धीरे – धीरे उसने पैसे जोड़ कर एक कार खरीद ली। कार खरीदने का उसका सपना पूरा हो चुका था और इससे वह बहुत खुश था। वह कार की बहुत अच्छी तरह देखभाल करता था और उसमें शान से घूमता था।

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एक दिन रविवार को वह कार को रगड़ – रगड़ कर धो रहा था। यहां तक कि गाड़ी के टायरों को भी चमका रहा था। उसका 5 वर्षीय बेटा भी उसके साथ था। बेटा भी पिता के आगे पीछे घूम – घूम कर कार को साफ होते देख रहा था। कार धोते धोते अचानक उस आदमी ने देखा कि उसका बेटा कार के बोनट पर किसी चीज़ से खुरच – खुरच कर कुछ लिख रहा है। यह देखते ही उसे बहुत गुस्सा आया। वह अपने बेटे को पीटने लगा। उसने उसे इतनी जो़र से पीटा कि बेटे के हाथ की एक उंगली टूट गयी। दरअसल वह आदमी अपनी कार को बहुत चाहता था और वह बेटे की इस शरारत को बर्दाश्त नहीं कर सका ।

बाद में जब उसका गुस्सा कुछ कम हुआ तो उसने सोंचा कि जा कर देखूँ कि कार में कितनी खरोंच लगी है। कार के पास जा कर देखने पर उसके होश उड़ गये। उसे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वह फूट – फूट कर रोने लगा। कार पर उसके बेटे ने खुरच कर लिखा था  I love you Papa.  आई लव यू पापा !

दोस्तों गुस्से में हम अपनी सोचने समझने की शक्ति खो देते हैं और अक्सर गलत फैसले ले लेते हैं | जिससे हमें बाद में बहुत नुकसान उठाना पड़ता है, बहुत पछताना पड़ता है |  इसलिए गुस्से में आकर कोई गलत फैसला लेने से पहले या कोई गलत क़दम उठाने से पहले हमें ये ज़रूर सोंचना चाहिये कि हमारे इस फैसले का अंजाम क्या होगा?


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बाड़े की कील

12बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक लड़का रहता था | वह बहुत ही गुस्सैल था, छोटी-छोटी बात पर अपना आपा खो बैठता था और लोगों को भला-बुरा कह देता था | उसकी इस आदत से उसके पिता बहुत परेशान थे |  उसकी इस आदत से परेशान होकर एक दिन उसके पिता ने उसे कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि , ” अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना.” | लड़का कील लेकर चला गया | पहले दिन उस लड़के को चालीस बार गुस्सा आया और उसने इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी| पर धीरे-धीरे कीलों की संख्या घटने लगी,उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने गुस्से पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद तक काबू करना सीख लिया | और फिर एक दिन ऐसा आया कि उस लड़के ने पूरे दिन में एक बार भी गुस्सा नहीं किया | जब उसने अपने पिता को ये बात बताई तो उन्होंने ने फिर उसे एक काम दे दिया, उन्होंने कहा कि ,” अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो इस बाड़े से एक कील निकाल देना |” लड़के ने ऐसा ही किया, और कुछ समय बाद वो दिन भी आ गया जब लड़के ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने पिता को ख़ुशी से ये बात बतायी| तब पिताजी उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, ” बेटे तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो | अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था | जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं |” लड़का अपने पिता कि बात का मतलब समझ चुका था | दोस्तों गुस्से में कभी कभी हम ऐसा काम कर जाते हैं या कुछ ऐसी बात बोल जाते है जिससे दूसरो के दिलो पर बहुत गहरा घाव बन जाता है | गुस्से में हमारे धन का नुकसान तो होता ही है साथ ही साथ रिश्ते नाते भी ख़त्म हो जाते हैं और यहाँ तक की परिवार तक बिखर जाते हैं | और जब हमारा गुस्सा ठंडा होता है तो सिवाय पछताने के कुछ नहीं बचता | इसलिये कभी भी गुस्सा न करें और थोड़ा बहुत गुस्सा आ भी जाये तो अपना ध्यान गुस्से वाली बात से हटाकर दूसरी जगह लगाएं और गुस्से के दौरान बहुत ही सोच समझकर किसी से कुछ बोलें |


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दृढ संकल्प से मिलती है सफलता

हम सभी को कभी ना कभी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है | कभी कभी किसी की कोई बात इतनी कड़वी लग जाती कि हम बहुत दुखी हो जाते हैं | कुछ लोग ऐसी बातो से परेशान होकर तनावग्रस्त हो जाते हैं वहीँ कुछ लोग ऐसी बातो को चुनौती की तरह लेते हैं | इतिहास गवाह है की जिन लोगो ने मुश्किलों को चुनौती की तरह लिया है उन्होंने बुलंदियों को छुआ है |

ऐसी ही एक कहानी से मैं आपको रूबरू करा रहा हूँ |

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प्राचीन काल में एक राज्य था मालव | इस राज्य की राजकुमारी विद्योत्तमा बहुत ही रूपवती और अत्यंत बुद्धिमान थी | उसने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई भी उसे शास्त्रार्थ में हरा देगा वह उसी से विवाह करेगी | विद्योत्तमा से विवाह करने की इच्छा लेकर दूर दूर से अनेकों विद्वान आये लेकिन कोई भी उसे शास्त्रार्थ में हरा नहीं सका | तब अपमान से दुखी होकर उनमे से कुछ विद्वानो ने राजकुमारी से बदला लेने के लिए एक चाल चली | जिससे वे राजकुमारी का विवाह एक मूर्ख व्यक्ति से करवा सकें |

उन्होंने एक मूर्ख व्यक्ति की खोज शुरू कर दी | एक दिन जंगल में उन्होंने एक ऐसे युवक को देखा जो उसी डाल को काट रहा था जिस पर वह बैठा हुआ था | उन्हें वह मूर्ख व्यक्ति मिल गया जिसकी उन्हें तलाश थी | उन्होंने उस मूर्ख युवक को समझा कर तैयार कर लिया और उससे कहा कि यदि तुम मौन रहे तो हम तुम्हारा विवाह राजकुमारी से करवा देंगे |

वे उस युवक को अच्छे से कपडे पहनाकर विद्योत्तमा के पास ले आये और विद्योत्तमा से कहा कि ये युवक मौन साधना में रत होने के कारण संकेतो में शास्त्रार्थ करेगा | विद्योत्तमा संकेतो में प्रश्न पूछती और वह युवक संकेतो में ही उसका उत्तर देता | जैसे एक प्रश्न में विद्योत्तमा ने युवक को प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया तो उस मूर्ख युवक ने समझा कि यह थप्पड़ मरने कि धमकी दे रही है | उसके जवाब में उस युवक ने घूँसा दिखाया जिससे विद्योत्तमा को लगा कि वह कह रहा है कि पांचो इन्द्रियां भले ही अलग हों लेकिन सभी एक मन के द्वारा संचालित होती है | संकेतो में बात करने के कारण तथा हारे हुए विद्वानो द्वारा उन संकेतो कि बढ़ा चढ़ा कर व्याख्या करने के कारण विद्योत्तमा को अंत में हार माननी पड़ी और उसने उस मूर्ख युवक से विवाह कर लिया |

कुछ दिनों तक वह युवक मौन साधना का ढोंग करता रहा लेकिन एक दिन ऊँट को देखकर गलत उच्चारण कर बैठा जिससे विद्योत्तमा को सच्चाई का पता चल गया कि उसका पति एक मूर्ख तथा अनपढ़ है | क्रोध में आकर विद्योत्तमा ने उस युवक को धिक्कारते हुए अपमानित करके महल से निकाल दिया | और उससे कहा कि जब तक सच्चे विद्वान ना बन जाओ तब तक वापस लौटकर मत आना |

उस युवक ने उस अपमान को चुनौती कि तरह लेते हुए संकल्प लिया कि वह एक दिन उच्च कोटि का विद्वान बन कर ही रहेगा | संयोग से आचार्य उदयन उसे मिल गए | जिनकी दी हुई शिक्षा व शास्त्रो के कठोर अध्ययन तथा परिश्रम से वह युवक महान विद्वान बन गया | आचार्य की हर परीक्षा में खरा उतरने के बाद वह विदा लेते उनके चरणो में विनत हुआ तो आचार्य ने कहा कि मैं तो मार्ग दिखने वाला एक मार्गदर्शक हूँ | तुम उस देवी का आभार मानो जिसने तुम्हे अपमानित किया जिससे तुम्हारे अंदर वह तड़प, वह जूनून पैदा हुआ जिससे तुम आज एक महान विद्वान हो, नहीं तो तुम आज भी वही मूर्ख तथा अनपढ़ रहते |

उसके बाद वह युवक वापस महल लौटा और उसने विद्योत्तमा को अपना पथप्रदर्शक गुरु माना और विद्योत्तमा ने भी उसे अपना जीवनसाथी माना | उसके बाद सम्राट विक्रमादित्य ने उसे अपने नवरत्नों में शामिल किया | तथा बाद में युवक महाकवि तथा संस्कृत का महा विद्वान् बना तथा उसने अनेकों रचनाएँ, अनेकों ग्रन्थ लिखे |

उस युवक का नाम था महाकवि कालिदास |

तो दोस्तों परेशानियां,कठिनाइयां सभी के साथ होती हैं | अगर आपके माता पिता, भाई या कोई प्रिय मित्र आपको डांटता है या ये कहता है कि तुम किसी लायक नहीं हो तो प्लीज इससे दुखी ना हों | दरअसल वे आपके अंदर उस तड़प को, उस जूनून को जगाना चाहते हैं जिससे आप नालायक से लायक बन सको और अपनी ज़िंदगी में ऊंचाइयों को छू सको |

उनकी डाँट को एक चुनौती की तरह लो तथा दृढ संकल्प के साथ लक्ष्य बना कर जुट जाओ | एक दिन आप उस बुलंदी पर जरूर पहुंचोगे जहाँ तक पहुँचने का आपने सपना देखा है |

जब एक मूर्ख, अनपढ़ व्यक्ति कालिदास बन सकता है तो आप अपने लक्ष्य तक क्यों नहीं पहुँच सकते ……. जरुर पहुंचोगे …..शुरुआत तो करो  |


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सफलता के लिए संलग्नता जरुरी है

एक आश्रम में एक शिष्य शिक्षा ले रहा था | जब उसकी शिक्षा पूरी हो गयी तो विदा लेने के समय उसके गुरु ने उससे कहा – वत्स, यहां रहकर तुमने शास्त्रो का समुचित ज्ञान प्राप्त कर लिया है , किंतु कुछ उपयोगी शिक्षा अभी शेष रह गई है। इसके लिए तुम मेरे साथ चलो।

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शिष्य गुरु के साथ चल पड़ा। गुरु उसे आश्रम से दूर एक खेत के पास ले गए। वहां एक किसान अपने खेतों को पानी दे रहा था। गुरु और शिष्य उसे गौर से देखते रहे। पर किसान ने एक बार भी उनकी ओर आँख उठाकर नहीं देखा। जैसे उसे इस बात का अहसास ही ना हुआ हो कि उसके पास में कोई खड़ा भी है। कुछ देर बाद गुरु और शिष्य वहां से चल दिए |

वहाँ से आगे बढ़ते हुए उन्होंने देखा कि एक लुहार भट्ठी में कोयला डाले उसमें लोहे को गर्म कर रहा था। लोहा लाल होता जा रहा था। लुहार अपने काम में इस कदर मगन था कि उसने गुरु शिष्य की ओर जरा भी ध्यान नहीं दिया। कुछ देर बाद गुरु और शिष्य वहां से भी चल दिए |

फिर दोनों आगे बढ़े। आगे थोड़ी दूर पर एक व्यक्ति जूता बना रहा था। चमड़े को काटने, छीलने और सिलने में उसके हाथ काफी सफाई के साथ चल रहे थे। कुछ देर बाद गुरु ने शिष्य को वापस चलने को कहा।

शिष्य को कुछ समझ में नहीं आया | उसके मन में प्रश्न उठने लगे कि आखिर गुरु चाहते क्या हैं ? शिष्य के मन कि बात को भाँपते हुए गुरु ने उससे कहा – वत्स, मेरे पास रहकर तुमने शास्त्रों का अध्ययन किया लेकिन व्यवहारिक ज्ञान की शिक्षा बाकी थी। तुमने इन तीनों को देखा। ये अपने काम में संलग्न थे। अपने काम में ऐसी ही तल्लीनता आवश्यक है, तभी व्यक्ति को सफलता मिलेगी।

दोस्तों इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि हमें अपने काम को इतनी ही तल्लीनता, संलग्नता, और एकाग्रता के साथ करना चाहिए | जब हम किसी काम को करे तो हमारे दिमाग में उस काम के अलावा कुछ नहीं होना चाहिए | तभी हमें सफलता मिल सकती है |


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